मीणा इतिहास



आमुख

मीणों का प्रस्तुत इतिहास एक संयोग की बात है। मेरे आदरणीय मित्र कुंवर चंद्रसिंह ने एक दिन मीणों के ऐतिहासिक विवरण के संकलन में जुटे हुए श्री झंूथालाल नांढ़ला से परिचय करवाया और इतिहास लिखाने की उनकी इच्छा का उल्लेख किया। मैं इतिहासकार नहीं हूं, फिर भी मुझे इस कार्य में अनायास रुचि प्रतीत हुई और मैंने हां भर ली। श्री झूंथालाल ने मौखिक तथा लिखित रूप से प्राप्त होने वाली विविध प्रकार की सामग्री एकत्रित कर रखी थी और बही-भाटों से वं ा-वृक्षों की प्रतिलिपियां भी प्राप्त कर ली थी। उक्त सारी सामग्री लेकर वे मेरे पास आए। सामग्री को मोटे तौर पर देखने के बाद उसके आधार पर एक स्थूल जानकारी मात्र दे सकने की संभावना ही मुझे प्रतीत हुई। अत: मेरी कल्पना एक ऐतिहासिक कथानक प्रस्तुत करने भर की थी।
समय बीतता गया और श्री झूंथालाल अपने अथक परिश्रम और लगन से इतिहास-लेखन का कार्य प्रारंभ करने के लिए आव यक साधन जुटाने में जुटे रहे। यह उनकी नि:स्वार्थ भावना और दृढ़ लगन का ही परिणाम था कि वे साधनों को जुटा पाए। काम प्रारंभ करते समय इतिहास की विशय-सूची तैयार करने पर प्रामाणिक सामग्री का नितांत अभाव दृश्टिगोचर हुआ। राजस्थान के इतिहासकारों में कर्नल टॉड को छोड़कर सभी ने मीणों के इतिहास पर या तो कुछ लिखा ही नहीं और यदि कुछ लिखा भी है तो वह अति नगण्य और सहानुभूति से रहित ही नहीं पूर्वाग्रहों से युक्त होकर लिखा है। मीणों को उन्होंने जंगली, चोर-धाड़ी, भाूद्र और आि ाक्षित तथा असंस्कृत जाति घोशित कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझली है। ऐसी स्थिति में उनके उज्ज्वल अतीत की पुश्टि किन आथारों पर की जा सकती थी?
इसी उधेड़-बुन में मैंने कुछ विद्वान मित्रों तथा प्रसिद्ध इतिहास प्रेमियों से चर्चा प्रारम्भ की। गजेटियर विभाग के विद्वान इतिहासज्ञ श्री सिंह से बातचीत के दौरान उन्होंने इण्डियन एण्टीक्वेरी में प्रकाि ात कुछ सामग्री की ओर मेरा ध्यान आकर्शित किया। एण्टीक्वेरी की कई जिल्दें उलटने पर श्री सैलेटोर का एक पर्याप्त लंबा निबंध मिला। जिसमें उन्होंने मीणों की विस्ताररपूर्वक चर्चा की है। इसी लेख से मुझे प्रस्तुत इतिहास का मार्गद र्ान मिला और वह मूलसूत्र मेरे हस्तगत हुआ जिसके सहारे मैं आगे बढ़ता गया। इस लेख से मेरे समूचे दृश्टिकोण में एक नाटकीय परिवर्तन आ गया और मैंने मीणों का एक यथासंभव वैज्ञानिक इतिहास प्रस्तुत करने का नि चय किया। आर्क्योलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, एपीग्राफिया इण्डिका, कैंम्ब्रिजहिस्ट्री, इलियट डाउसन आदि अनेक सुप्रसिद्ध ग्रंथों के पृश्ठों में मुझे विविध प्रकार की उपयोगी जानकारी मिली। श्री झूंथालाल द्वारा संग्रहित भण्डार का यथा ाक्य उपयोग किया।
इसी बीच मीणों के प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों को देखना आव यक समझ मैंने कुछ उत्साही समाज-सेवकों के साथ खोड़, मांची, आमेर, भांडारेज, नई, दौसा, राजोरगढ़, नरैठ, क्यारा, नाराणी, मांचेड़ी आदि स्थानों का भ्रमण किया। इस यात्रा ने मुझे मीणों के बहुसंख्यक थोकों और उनकी परंपरागत भूमि तथा उनके रहन-सहन आदि की जानकारी दी। इस यात्रा में उन सुप्रसिद्ध स्थानों के चित्र भी लिए गए जो इस पुस्तक में यथास्थान प्रकाि ात किए गए हैं। इतिहास संबंधी मौखिक इतिवृत्त की सत्यता जानने के लिए मेरे आग्रह पर श्री झूंथालाल ने मीणा के जागाओं, डूमों तथा बड़े-बूढ़ों की कई गोश्ठियां आमंत्रित की जिनसे विस्तारपूर्वक चर्चा कर मैंने परम्परागत इतिहास की बातें लिपिबद्ध की।
व्यक्तिगत रूप से मैंने जोधपुर, अजमेर, उदयपुर आदि स्थानों की यात्राओं में भी मीणों से संबंधित उपयोगी जानकारी का संकलन किया।
मीणा-समाज के रत्न स्वर्गीय मुनि मगनसागर द्वारा लिखित 'मीनपुराण भूमिका` तथा 'मीनपुराण` नामक ग्रंथों से भी मुझे मीणों के इतिहास की कई उपयोगी बातें ज्ञात हुई। मीणा समाज में यही सर्वप्रथम विद्वान हुए हैं जिन्होंने मीणों का इतिहास प्रस्तुत करने की चेश्टा की। मुनिश्री गोठवाल जाति के मीणा थे और उन्होंने जैन धर्म में दीक्षित होकर संस्कृत, प्राकृत आदि के वाङ्मय का अध्ययन किया था जिससे भारतीय संस्कृत साहित्य का उनको विस्तृत ज्ञान था। 'मीनपुराण` नामक स्वतंत्र पुराण की रचना उनके इस ज्ञान की ही परिचायक है। खेद है कि ऐसे विद्वान को इतिहास विद्या के आधुनिक ज्ञाता का सहयोग नहीं मिल पाया। अन्यथा वे मीणा-समाज का बहुत बड़ा उपकार करने में समर्थ होते।
समय तथा साधनों के अभाव में मीणों का यह ऐतिहासिक इतिवृत्त मात्र प्रस्तुत करके संतोश करना पड़ रहा है। इस महान जाति का विस्तृत और प्रामाणिक इतिहास तैयार करने के लिये इनके परम्परागत स्थानों का भ्रमण करके प्राचीन स्मारकों को देखने तथा लोक-मुख पर चले आ रहे प्रवादों आदि के संग्रह करने की बड़ी आव यकता है। राजस्थान तथा बाहर के ऐसे सभी स्थानों को देखने के लिये पर्याप्त समय और साधन चाहिये। ऐसा होने पर ही इस जाति का बृहत् इतिहास प्रस्तुत किया जा सकेगा। यह प्रसन्नता का विशय है कि मीणा-समाज के सुपठित लोग इस कार्य की ओर सचेत हैं और वि ोशकर श्री झूंथालाल की लगन और सामर्थ्य से यह कार्य सम्पन्न होगा, ऐसा मेरा वि वास है।
अंत में पुस्तक के प्रस्तुतीकरण में जिन मित्रों तथा विद्वानों से मुझे सहयोग मिला है उन्हें धन्यवाद देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। सर्वश्री रामवल्लभ सोमाणी, सीताराम लाळस, सौभागसिंह भोखावत, कृश्णचन्द्र भाास्त्री, बृजमोहन जावलिया, गिरी ा भार्मा, कानसिंह रावत, अमरीकसिंह तथा कुंवर संग्रामसिंह भोखावत ने मुझे समय-समय पर उपयोगी सुझाव, जानकारी तथा सामग्री देकर अनुग्रहीत किया है। प्रिय मुरलीधर भार्मा ने अनेक कश्ट सहकर मेरे साथ यात्रायें की और सभी स्थानों के फोटो खींचकर मुझे अपना स्नेह दिया।
जयपुर स्थित महाराजा पब्लिक लाइब्रेरी के विद्वान पुस्तकाध्यक्ष श्री दीपसिंह तथा श्री राव का सहयोग भी मेरे लिये बड़ा सहायक रहा। मीणा-समाज के उत्साही और नि:स्वार्थसेवी महानुभावों सर्वश्री गुलाबचंद गोठवाळ, रामसहाय सीहरा, अरिसालसिंह छापोला, चंदालाल व्याड़वाळ, लक्ष्मीनारायण झरवाळ, कि ानलाल वर्मा आदि ने जो रुचि प्रदि र्ात की उससे मुझे प्रेरणा मिली है। समाज के अन्य अनेक साथियों ने भी मुझसे मिलकर मेरे कार्य की सराहना की जिसके लिये मैं उन सबका आभारी हूं। अंत में राजस्थान राज्य के मुख्यमंत्री माननीय मोहनलाल सुखाड़िया तथा राजस्थान प्रदे ा कांग्रेस के अध्यक्ष माननीय श्री नाथराम मिर्धा के प्रति भी मैं कृतज्ञता प्रकट करना चाहता हूं जिन्होंने पुस्तक के लिए 'दो भाब्द` तथा 'सम्मति` लिखने की कृपा की। (जयपुर, ऋशि पंचमी, २०२५ वि.)

1 comment:

  1. मीणा जाति का पुरा इतिहास सामने आना चाहिए

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