मीणा इतिहास



आमुख

मीणों का प्रस्तुत इतिहास एक संयोग की बात है। मेरे आदरणीय मित्र कुंवर चंद्रसिंह ने एक दिन मीणों के ऐतिहासिक विवरण के संकलन में जुटे हुए श्री झंूथालाल नांढ़ला से परिचय करवाया और इतिहास लिखाने की उनकी इच्छा का उल्लेख किया। मैं इतिहासकार नहीं हूं, फिर भी मुझे इस कार्य में अनायास रुचि प्रतीत हुई और मैंने हां भर ली। श्री झूंथालाल ने मौखिक तथा लिखित रूप से प्राप्त होने वाली विविध प्रकार की सामग्री एकत्रित कर रखी थी और बही-भाटों से वं ा-वृक्षों की प्रतिलिपियां भी प्राप्त कर ली थी। उक्त सारी सामग्री लेकर वे मेरे पास आए। सामग्री को मोटे तौर पर देखने के बाद उसके आधार पर एक स्थूल जानकारी मात्र दे सकने की संभावना ही मुझे प्रतीत हुई। अत: मेरी कल्पना एक ऐतिहासिक कथानक प्रस्तुत करने भर की थी।
समय बीतता गया और श्री झूंथालाल अपने अथक परिश्रम और लगन से इतिहास-लेखन का कार्य प्रारंभ करने के लिए आव यक साधन जुटाने में जुटे रहे। यह उनकी नि:स्वार्थ भावना और दृढ़ लगन का ही परिणाम था कि वे साधनों को जुटा पाए। काम प्रारंभ करते समय इतिहास की विशय-सूची तैयार करने पर प्रामाणिक सामग्री का नितांत अभाव दृश्टिगोचर हुआ। राजस्थान के इतिहासकारों में कर्नल टॉड को छोड़कर सभी ने मीणों के इतिहास पर या तो कुछ लिखा ही नहीं और यदि कुछ लिखा भी है तो वह अति नगण्य और सहानुभूति से रहित ही नहीं पूर्वाग्रहों से युक्त होकर लिखा है। मीणों को उन्होंने जंगली, चोर-धाड़ी, भाूद्र और आि ाक्षित तथा असंस्कृत जाति घोशित कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझली है। ऐसी स्थिति में उनके उज्ज्वल अतीत की पुश्टि किन आथारों पर की जा सकती थी?
इसी उधेड़-बुन में मैंने कुछ विद्वान मित्रों तथा प्रसिद्ध इतिहास प्रेमियों से चर्चा प्रारम्भ की। गजेटियर विभाग के विद्वान इतिहासज्ञ श्री सिंह से बातचीत के दौरान उन्होंने इण्डियन एण्टीक्वेरी में प्रकाि ात कुछ सामग्री की ओर मेरा ध्यान आकर्शित किया। एण्टीक्वेरी की कई जिल्दें उलटने पर श्री सैलेटोर का एक पर्याप्त लंबा निबंध मिला। जिसमें उन्होंने मीणों की विस्ताररपूर्वक चर्चा की है। इसी लेख से मुझे प्रस्तुत इतिहास का मार्गद र्ान मिला और वह मूलसूत्र मेरे हस्तगत हुआ जिसके सहारे मैं आगे बढ़ता गया। इस लेख से मेरे समूचे दृश्टिकोण में एक नाटकीय परिवर्तन आ गया और मैंने मीणों का एक यथासंभव वैज्ञानिक इतिहास प्रस्तुत करने का नि चय किया। आर्क्योलोजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया, एपीग्राफिया इण्डिका, कैंम्ब्रिजहिस्ट्री, इलियट डाउसन आदि अनेक सुप्रसिद्ध ग्रंथों के पृश्ठों में मुझे विविध प्रकार की उपयोगी जानकारी मिली। श्री झूंथालाल द्वारा संग्रहित भण्डार का यथा ाक्य उपयोग किया।
इसी बीच मीणों के प्राचीन ऐतिहासिक स्थलों को देखना आव यक समझ मैंने कुछ उत्साही समाज-सेवकों के साथ खोड़, मांची, आमेर, भांडारेज, नई, दौसा, राजोरगढ़, नरैठ, क्यारा, नाराणी, मांचेड़ी आदि स्थानों का भ्रमण किया। इस यात्रा ने मुझे मीणों के बहुसंख्यक थोकों और उनकी परंपरागत भूमि तथा उनके रहन-सहन आदि की जानकारी दी। इस यात्रा में उन सुप्रसिद्ध स्थानों के चित्र भी लिए गए जो इस पुस्तक में यथास्थान प्रकाि ात किए गए हैं। इतिहास संबंधी मौखिक इतिवृत्त की सत्यता जानने के लिए मेरे आग्रह पर श्री झूंथालाल ने मीणा के जागाओं, डूमों तथा बड़े-बूढ़ों की कई गोश्ठियां आमंत्रित की जिनसे विस्तारपूर्वक चर्चा कर मैंने परम्परागत इतिहास की बातें लिपिबद्ध की।
व्यक्तिगत रूप से मैंने जोधपुर, अजमेर, उदयपुर आदि स्थानों की यात्राओं में भी मीणों से संबंधित उपयोगी जानकारी का संकलन किया।
मीणा-समाज के रत्न स्वर्गीय मुनि मगनसागर द्वारा लिखित 'मीनपुराण भूमिका` तथा 'मीनपुराण` नामक ग्रंथों से भी मुझे मीणों के इतिहास की कई उपयोगी बातें ज्ञात हुई। मीणा समाज में यही सर्वप्रथम विद्वान हुए हैं जिन्होंने मीणों का इतिहास प्रस्तुत करने की चेश्टा की। मुनिश्री गोठवाल जाति के मीणा थे और उन्होंने जैन धर्म में दीक्षित होकर संस्कृत, प्राकृत आदि के वाङ्मय का अध्ययन किया था जिससे भारतीय संस्कृत साहित्य का उनको विस्तृत ज्ञान था। 'मीनपुराण` नामक स्वतंत्र पुराण की रचना उनके इस ज्ञान की ही परिचायक है। खेद है कि ऐसे विद्वान को इतिहास विद्या के आधुनिक ज्ञाता का सहयोग नहीं मिल पाया। अन्यथा वे मीणा-समाज का बहुत बड़ा उपकार करने में समर्थ होते।
समय तथा साधनों के अभाव में मीणों का यह ऐतिहासिक इतिवृत्त मात्र प्रस्तुत करके संतोश करना पड़ रहा है। इस महान जाति का विस्तृत और प्रामाणिक इतिहास तैयार करने के लिये इनके परम्परागत स्थानों का भ्रमण करके प्राचीन स्मारकों को देखने तथा लोक-मुख पर चले आ रहे प्रवादों आदि के संग्रह करने की बड़ी आव यकता है। राजस्थान तथा बाहर के ऐसे सभी स्थानों को देखने के लिये पर्याप्त समय और साधन चाहिये। ऐसा होने पर ही इस जाति का बृहत् इतिहास प्रस्तुत किया जा सकेगा। यह प्रसन्नता का विशय है कि मीणा-समाज के सुपठित लोग इस कार्य की ओर सचेत हैं और वि ोशकर श्री झूंथालाल की लगन और सामर्थ्य से यह कार्य सम्पन्न होगा, ऐसा मेरा वि वास है।
अंत में पुस्तक के प्रस्तुतीकरण में जिन मित्रों तथा विद्वानों से मुझे सहयोग मिला है उन्हें धन्यवाद देना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। सर्वश्री रामवल्लभ सोमाणी, सीताराम लाळस, सौभागसिंह भोखावत, कृश्णचन्द्र भाास्त्री, बृजमोहन जावलिया, गिरी ा भार्मा, कानसिंह रावत, अमरीकसिंह तथा कुंवर संग्रामसिंह भोखावत ने मुझे समय-समय पर उपयोगी सुझाव, जानकारी तथा सामग्री देकर अनुग्रहीत किया है। प्रिय मुरलीधर भार्मा ने अनेक कश्ट सहकर मेरे साथ यात्रायें की और सभी स्थानों के फोटो खींचकर मुझे अपना स्नेह दिया।
जयपुर स्थित महाराजा पब्लिक लाइब्रेरी के विद्वान पुस्तकाध्यक्ष श्री दीपसिंह तथा श्री राव का सहयोग भी मेरे लिये बड़ा सहायक रहा। मीणा-समाज के उत्साही और नि:स्वार्थसेवी महानुभावों सर्वश्री गुलाबचंद गोठवाळ, रामसहाय सीहरा, अरिसालसिंह छापोला, चंदालाल व्याड़वाळ, लक्ष्मीनारायण झरवाळ, कि ानलाल वर्मा आदि ने जो रुचि प्रदि र्ात की उससे मुझे प्रेरणा मिली है। समाज के अन्य अनेक साथियों ने भी मुझसे मिलकर मेरे कार्य की सराहना की जिसके लिये मैं उन सबका आभारी हूं। अंत में राजस्थान राज्य के मुख्यमंत्री माननीय मोहनलाल सुखाड़िया तथा राजस्थान प्रदे ा कांग्रेस के अध्यक्ष माननीय श्री नाथराम मिर्धा के प्रति भी मैं कृतज्ञता प्रकट करना चाहता हूं जिन्होंने पुस्तक के लिए 'दो भाब्द` तथा 'सम्मति` लिखने की कृपा की। (जयपुर, ऋशि पंचमी, २०२५ वि.)

बखत रै परवाण



सनमंध

सरदी में सिरखां सा, गरमी पाथरणा
मिलतां तो ब्याज जिसा, बीछड़तां भरणा

साबत हथबीजणियां, टूटता बळीता
जगतां मुसालां सा, (पण) बळता पळीता

अणचींती ओळख सा, क्रितघण बिसराया
जुड़ता तो पुळ सा पण बिलगंता खायां

होठां री मुळक तळै पोटां जहरां री
निजरां मंे गिरजणियां भूंडां चहरां री

मिसरी सा बोलां में, तिरसूळी फांसां
सरमां रै सरबत में, भरमां री गांसां

बगलां में छूरियां अर कत्तरण्यां हाथां
जद-कद भर लेसी अै अणचींती बाथां

लजखाणा कूकरिया, टूकरिया पड़तां
हिरणां री डार भिळै सूकरिया लड़तां

घातेरण छिपकलियां, दबकणती चीती
मसवासण मिनकी, सब बुगलाई नीती

अंग-अंग सिलैपोस, बंध-बंध परबंध
अूजड़ सी गैल-गैल, सूळ-सूळ सरमंध


कुण समझाग्यो

कुण समझाग्यो मनैं ओ मरम
कै राजनीत रा अजगरां सूं लेय`र
दफ्तरां रा कमटाळू घूसखाऊ बाबुआं तकात
सगळां रा कांसां बाटकां में नित परूसीजै
रिकसो खींचतै म्हारै बूढ़ै बाप री थाकल फींचां रो खून-पसानो
कमठाणै भाठा फोड़ती
कै तगारी ले तिमंजलै चढ़ती-उतरती
म्हारी हेजल भा रा हांचळां रो सूखतो दूध
अर नानड़ियै नैं बोबै री ठोड गूंठो चुंघाती
म्हारी बैन रा झरता आंसू अर कसकतो काळजो।

कुण समझाग्यो मनैं
गरीबी हटाओ रा भासणां रो तर-तर खुलतो ओ भेद
ज्यूं झालर बाजतां अर संख फूंकीजता पाण
आपै ही उठता पग ठाकुरद्वारै कानी
अर साध पूरण रा सुपनां में
डोलरहींडै चढ़तो-उतरतो मुरझायो मन,
त्यूं ही तीस-तीस बरसां तक
आये पांचवैं साल
खोखां में घालता गया सुपनां रा पुरजिया
अर उडीकता गया अंधारै में आखड़ता
उण झीणै परगास री गुमसुदा किरण।
ओजूं घूमड़ै है बादळा आज
ओजूं अूकळै है अमूझो
कीड़्यां रै पांखां ओजूं निकळण लागगी है
व्यापगो है रिंधरोही मंे भींभर्यां रो भरणाट
उड़ता बधाऊड़ा देवण लाग्या है कसूण
पण अै मंडाण मंगळ मेघ रा नीं है भायां
सत्यानासी है अकाळ री आ बरखा
धान री ढिगलियां ढाती
छान-झूंपड़ा उजाड़ती
थोथा भरमां में पाळती
एकर फेर पंच-बरसी नींद ज्यूं औसरसी।
इन्दर रै घर राणी बण बैठी
आ महामाया
ओजूं फूंकसी थारा कानां में
'गरीबी हटाओ` रो गुपत ग्यान
अर थे समझता हुयां भी
फेर बण जाओला अणजाण
फेर दूध रै भोळै
पी जावोला घोळ्योड़ो चून
क्यूंकै गरीबी में रैणो थारी नियति है।

काळ

कुण कैवै काळ पड़ग्यो!
कठै है काळ
तिसाई धरती रै ताळवै चिप्योड़ा
बळबळती बाळू सूं भूंज्योड़ा
फूस री टापर्यां अर झूंपां रा
उजड़्योड़ा गांवां अर ढाणियां रा
अै निरभागिया जीव
क्यूं जलम लियो इण खोड़ में!

कायर हा, बुजदिल हा, बेवकूफ हा
आं रा पुरखा
जिका इण निरभागी धरती में,
लुक`र प्राण बचाया!
लूंठा हा, वीर हा, सायर हा वै
जिका माळ री धरती नैं दाबी राखी
अर देसनिकाळो दियो बां नाजोगां नैं

तनतोड़ मैनत कर भी
जिका दो जूण टुकड़ा नीं तोड़ पाया
गधां री ज्याूं लद-लद भी
जिका टेम पर दाणां री जगां लातां खाई
बांरै खातर धरती रा सुख कोनी सिरज्योड़ा
भाग री भ्रगु-संहिता में
बांरी कुंडळी नैं जगां कोनी!

अै अंजन रा कूआ, अै दाखां रा बाग
अै गरणाटा टैक्टर, अै कोसां लग खेत
अै छळछळती नहरां, अै कमतरिया चाकर
अै फारम, अै जीपां, आ दारू, आ चोधर
सुख रा अै साधन बांरा कियां हो सकै!
बीजळी सूं गरमायोड़ा
बीजळी सूं ठण्डायोड़ा
बीजळी सूं चमकायोड़ा
बीजळी ज्यूं पळपळाता
अै आलीसान बंगला!
बांरा कियां हो सकै!

अै कुन्नण ज्यूं दमकती, चन्नण ज्यूं महकती
नागकुंडाळा सा केसां रा जूड़ा सजावती
चोलीदार ब्लाउजां में
गोरै चीकणै डील रा पळका मारती
टेरालीन में सरसर करती
सरसराती कारां नैं दौड़ाती
अै नाजुकड़ी हिरणाखियां
बांरी कियां हो सकै!

धरती रो ओ सुरग बांरो है
जिका भुजबळ रा धणी है
जिका गज रो काळजो अर
मिनख रो मगज राखै
जिकां में हौंसलो है संघर्सा सूं जूझणै रो
अर सामरथ है घिरतै बखत सूं
बांथां भर लड़णै री। ........

चांद : आज अर काल

जुगां-जुगां तक किसन कन्हैया
बाल हठीला, ठिणक-ठिणक कर
रया मांगता चांद खिलूणो।
पण बापड़ी जसोदावां के करती
भर-भर जळ रा ठांव, दिखा कर
झूठ-मूठ रा चांद, भुळाती, लाल मनाती।

पण अब धन-धन भाग धरण रा
काल, जसोदावां जुग री घर हरख मनासी
गोदी में ले किसन लाडला
चांदड़लै रै देस रमासी
सुपनां री परियां नैं सांप्रत-
गिगन-झरोखै बैठ बुलासी, नाच नचासी।

जुगां-जुगां रा भरम टूटसी
आंधा बिसवासां गढ़ भिळसी
चरखा और डोकर्यां गुड़सी
सींगाळा मिरधा भी रुळसी
मामो चांद दिसावर जासी
अब टाबरिया क्यूं बिलामासी!

भेद प्रकटसा अब सदियां रा
पोथां और पुराणां रा सै
उपमा और कल्पनावां सै कूड़ी होसी
चांद लोक रा गढ़-गढ़ लिख्या गपोड़ा
अब तो चौड़ै आसी।

धरती रा जायां रो धूंसो
बण बादळ री गाज घमकसी
चांदड़लै में मिनख जात री धजा फरकसी
देवो-देव-परी सब लुळ-लुळ मुजरा करसी।

कविता री ओळूं साठी में

बाळपणै भोळोड़ी आंख्यां में अंजती सी
कूदती, किलकती, मुळकती ही कविता
रूस रूसणा में, झट मनती मनावणां में
आळ-भोळ बातां में पुळकती ही कविता

ताळी दे तत्तातोड़ लुकती लुकमीचणियां
कुरवायां रूंखां झट चढ़ती ही कविता
चरमरती मगरां पर मारदड़्यां चोटां में
दोटां मन-गिगनारां उड़ती ही कविता

गींधड़ रा गेड़ा में, घमरोळा निरतंती
धमाळां में डफां पर थिरकती ही कविता
उमगती चावां में, भावां भरमीजती सी
अणदेख्या सुपनां सरमीजती ही कविता

चानणियै डागळियै लीलै द्रग असमानां
बावळती चिड़ी सी विचरती ही कविता
अणबोल्यां बोलां रा अूंडा अरथावा-भर्या
रूं-रूं में छंद मधर रचती ही कविता

उळझगी गिरस्थी रे तिसना-छळावै में
लूण-तेल-लकड़ी में फंसगी ही कविता
ज्यूं-ज्यूं करी कोसिसां बांह पकड़ खींचण री
त्यूं-त्यूं और गहरी ही धंसगी ही कविता

आज जद ढळती में चित आई परणेतण
डोकरड़ी पीवरियै अूठ चली कविता
बुध रां चिमगादड़ां घैर्यो मन-ढूंढ़ो अब
भली करी बखत सिर अूठ चली कविता

ओ कुण लुक-छिप आवै

नैण रिझावै मन मुळकावै, रूंआ रास रचावै
ओ कुण लुक-छिप आवै

सोई धरण जगावै, आंगणियै हींगळू ढुळावै
पांख पंखेरू गीत गुवावै, किरणां नाच नचावै
सांझ-गिगन मंे रांगरंगोली छिबिया कुण चितरावै
दूधां धोई रातड़ली में कुण इमरत बरसावै
ओ कुण लुक-छिप आवै

सांसां री सोरम सूं भोळा बायरिया बहकावै
फूलां फाग मचावै, हरिया बागां नैं महकावै
कळियां नैं इतरावै, लोभी भंवरां नैं बिलमावै
आंबलियै री डाळ उणमणी कोयलड़ी चहकावै
ओ कुण लुक-छिप आवै

काजळिया नैणां री कोरां में बैठ्यो सरमावै
फूल गुलाबी मुखड़ै पर क्यूं लाज-गुलाल लगावै
अंगड़ाया सूं छेड़ै, दरपण में गुपचुप बतळावै
अूंची मेड़ी लाल पिलंग रा सुपनां में भरमावै
ओ कुण लुक-छिप आवै

हेलो

संख फूंक्या देवरां
बाज्या ज जंगी ढोल
हेलो आइयो रण खेतर रो
उठ, जाग मा रा लाडला
अब बखत आयो चेत रो!

लोरियां री ताल सोवन-पालणै हुलराइयो
दूधां-धार धपाइयो, निस नैणां जाग जपाइयो
अब उठ, सपूती रा पूत, मांगूं मोल मूंघै हेत री
अब बखत आयो चेतरो
हेलो आइयो रण खेत रो!

जामण जाया, बीर म्हारा, गोद मोद खिलाइया
नित सलूणै, राखड़ी रा तार थे बंधवाइया
उठ, आरतड़ै रै नेग मांगू, सीस दुसमी दैत रो
हेलो आइबो रण खेत रो।

चौमुख दिवलो जोय, रंगमहलां ज सेज संवारती
बादीलै नैं बांहड़ी धर सीस, मुळक मनावती
अब जाग लसकरिया! लजै, सिणगार धण परणेत री
अब बखत आयो चेत रो
हेलो आइयो रणखेत रो।

मेवड़ला झड़ सींच, सूखी धरण धन निपजाइयो
काढ़ ऊंडै काळजै सूं नीर ठंडो प्याइयो
अब जाग मुरधररिया! चुकावण करज बाळू रेत रो
अब बखत आयो चेत रो
हेलो आइयो रण खेत रो।

वीरभोग्या

रूप री रास जिण नैण बिलमाइया
जुद्ध री झाळ तिण नैण प्रजळाइया

रंग री रैण जिण सैण रस माणियो
गाजतै जैण तिण जीस अूफाणियो

हींगळू ढोलियै संग हिरणाखियां
सुरग रो स्वाद जिण सांपरत जाणियो
हींसता हैवरां पीठ घर मांडियां
खीझ भर खींच तिण वीर सर ताणियो

काजळी केस लट लाडली लहरतां
बादळी घेरियो चांद जिण चूमियो
सांघणी फौज रा ढोल घण गहरता
बैरियां घेरियो वीर वो झूमियो

रूप सिणगार सुख स्वाद सब सिस्टि रा
वीर रै भोग विध विरचिया चाव सूं
रूप रस गंध री हाट उण लूट ली
ओज भर अंग जिण साजिया घाव सूं।

सुरसत नैं अरज

किण नै बिड़दाऊ ए सुरसत किण रो जस गाअूं
किण नैं म्हारोड़ा गीतां जुग-जुग पूजवाऊं, अमर बणाऊं

वाणी तूं दीन्ही ए मायड़, किरपा तूं कीन्ही
वाणी रै मोत्यां किण री माळ पुवाऊं, हार सजाऊं

धरती लचकावै कुण वो, आभै नैं तोलै
सातूं समदां री लहरां जिण री जय बोलै
इसड़ो नरसिंह बतादे जिण रो जस गाऊं, जिण नैं बिड़दाऊं

लिछमण सी झाळां जिण री हणवंत सी फाळां
रघुवर सा बाणां जिण रै परळै री ज्वाळा, चण्डी विकराळा
इसड़ी रामायण वाळो राम मिलादे ए मायड़ जिण नैं पुजवाऊं

जिण रा होठां पर सुर रा समद हिलोळै
जिण रा बैणां में गीता ज्ञान झिकोळै
इसड़ो सुद र सण वाळो स्याम दिखादे ए जामण जिण रो जस गाऊं

बलमीकी नावंू मैं तो, द्वैपायन ध्याअूं, तुळसी मनाअूं, सुर रो सूर बुलाऊं
जिण री लीला रा सौ-सौ छन्द रचाऊं
किण नैं बिड़दाऊं ऐ सुरसत किण रो जस गाऊं

हेली ए प्यारी साजन मिलबा जाऊं

मळ-मळ अंग निसंग रगड़-रगड़ कर न्हाऊं
कुन्नण काया तप उजळाऊं गुण-चन्नण चरचाऊं
सील तणो सोरम सरसाऊं निरगुणियै ने ध्याऊं

कंवळा केस कसायां धोऊं परगै हाथ निचाऊं
त्याग तणै झीणै तावड़ियै डागळ बैठ सुकाऊं
आई नेम नेवगण चतरी पीढ़ो ढाळ बिठाऊं

आटी, डोरा, ग्यान-कांगसी, दीपत बोर गुंथाऊं
काजळ, टीकी, बिंदली, लाली मेंहदी हाथ मंडाऊं
सज सोळा सिणगारां चुड़लो अमर सुहाग सजाअूं

पहर पटोळो धम्म घुमंतो घाघरियो घमकाऊं
रंग राचै कांचळी कसूमल घूंघटिये सरमाऊं
अणहद नाद रूणझुणै पायल रंगमहल जद जाऊं
रोम रोम में फुरणा व्यापी सरबस पीव समाऊं

हेली ऐ प्यारी साजन मिलवा जाऊं

मरोड़

कांईं मरोड़ धरै म्हारा मनड़ा कांईं गुमान करै
काया काची गार प्रिजापत हाथां रूप धरै
लख-लख जूण रची सिस्टी मैं पळ-पळ जलम मरै
पीपळ पात पड़ी जळ बुंदकी झोलो लाग झरै
सिख-नख रा सिणगार संजोवै जोबन गरब धरै
फूल खिलै सोरम गरणावै सांझ ढळ्यां बिखरै
बाग-बगीचा महल-माळिया चितरंग चोज करै
अूजड़ खेड़ां ढमढ़ेरां री अब कुण साख भरै
अनधन-लिछमी गरथ भंडारां जुग रा जतन करै
एक अगन चिणगी सूं थारा सारा काज सरै
रच छळ-छंद कपट विस्तारै निस दिन ठगी करै
खुद रे जाळ फंसी खुद मकड़ी देख कुमोत मरै
पद-मद में भूखां भोळां नैं चींथ न यूं इतरै
उछळै गींड गगन में वो ही धरण पड़्यो ठुकरै
कांईं मरोड़ धरै म्हारा मनड़ा कांईं गुमान करै

पीड़

मुळक-मुळक दुख सह म्हारा जिवड़ा हंस-हंस पीड़ पळोट
जिण दी काया उण दुख दीयो वो ही भोगण वाळो
थारी अपणी चीज न कोई जग भरमां रो कोट
मन दुख देवै मन सुख सेवै मन ही कामणगारो
मन कठपुतळी नाच नचावै वो पड़दै री ओट
पीड़ पंखेरू उडतो-फिरतो बिरछ-बिरछ री डाळां
वा बड़भागण कायक जिण घर लेवै दरद करोट
दुख-सुख तो रथ रै पैड़ै ज्यूं फिर-घिर आवै-जावै
संग जनमी संग चाल्यां जासी सुख-दुख री आ जोट
अगन तप्यां सूं सोनो उजळै ओखद सूं रस चूवै
दुख री दाझ करम रा काटै भव-भव रा सै खोट
दुख-बिणजारो बाळद ल्यायो सस्तो देवै सौदो
पैलां पूग बिसाले जिवड़ा करूणा री भर पोट

चाल-कुचाल

चाल कुचाल हुई थारी जिवड़ा बाण कुबाण पड़ी
जिण थारा लाड लडाया जिवड़ा जिण थानैं जनम दियो
जिण री महर खेलिया खाया रम-रम करी थड़ी
अूठत-बैठत सोवत-जागत अूमर बीत चली
उणनैं पण तूं याद कियो ना कदे एक घड़ी
किण कारण पिरथी पर आयो, कांईं काम कर्यो
कुणसी गरज सरी थारै संू कुणसी पार पड़ी
किसी भुळावण किसा संदेसा कुणनै मांड कह्या
मोटा धणी न रीझै थारी बातां बड़ी-बड़ी
टेढ़ो सोचै टेढ़ो चालै टेढ़ घणी बरतै
गत उळटी ना बिसरी थारी जनम-जनम पकड़ी
कुबदी मन अळबादी इन्दर्यां हरदम छेड़ करै
बाद करे अै सिर चढ़ बैठी थारी मती हड़ी
चाल-कुचाल हुई थारी जिवड़ा बाण कुबाण पड़ी